साहित्य, समाज और भारतीयता (Sahitya, Samaj aur Bhartiyta)

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Publisher: Northern Book Centre

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साहित्य, समाज और भारतीयता (Sahitya, Samaj aur Bhartiyta)

Summary of the Book

कल्पना जब वाणी वाहन पर बैठ उन्मुक्त विचरण करती है तो वीणा अपने आप बज उठती है और उसके तारों से झंकृत प्रत्येक स्वर कल्याणप्रद होता है। ऐसी कल्पना जब साहित्य में उतरती है तो वीणावादिनी स्वयं अपना रोम-रोम शब्द-शब्द में उतार देती हैं। समाज के लिए वह हितकारी होता है क्योंकि उसमें केवल कोमल पंखों की उड़ान ही नहीं होती वरन् भूमि की ऊष्मा और ऊर्जा भी उसमें समाई होती है। यह भूमि यदि भारत की ही हो और सम्पूर्ण भारतीयता ही अनन्त-ऊर्जा में परिणत हो जाए तो शब्द ब्रह्म के आह्नान पर हम सबमें बैठे देवताओं को इस धरा पर उतरने से कौन रोक सकता है? कोई नहीं! कोई नहीं!!

साहित्य समाज और भारतीयता नामक इस निबन्ध-संग्रह में जो भी निबन्ध हंै वह साहित्यकार के मन का विलास नहीं वरन् उसके प्राणों के उस असीमित-विस्तार का परिणाम हैं जो प्रवाहित समाज के प्रत्येक व्यक्ति के अन्तस् में बैठ, भू की हिमालयी ऊर्जा पर संचरण करते हुए, उसका सत्व प्राप्त करता है। अद्भुत! आश्चर्यजनक!! अविस्मरणीय!!!

दृष्टव्य


प्रोफेसर अवस्थी को बोलते सुनना एक सौभाग्य है। मैं इस सुयोग के लिए प्रभु का कृतज्ञ हूँ। प्रोफेसर अवस्थी जनता के व्यक्ति हैं, भीड़ से डरने वाले नहीं, उस पर सम्मोहन करने वाले वाणी के आचार्य हैं। वे श्रोता से हार्दिक सेतु बनाते हैं। श्रोता के हृदय-प्रदेश में संस्कृति के पद्म की पंखुरियों को धीमी थाप देकर खिलाते हैं, उसमें रूपश्री और सुगंध का आधान करते हैं, निःश्रीक खण्डहर को सुरूप प्रासाद में विकसित करते हैं। मैंने श्रोता के भीतर चित्राकारी करने वाला ऐसा विलक्षण चित्रकार दूसरा नहीं देखा।

प्रोफेसर भगवान शरण भारद्वाज
महात्मा ज्योतिबा फुले रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली

अभिमत

डाॅ. ब्रह्मदत्त अवस्थी भारतीयता के प्रस्तोता और व्याख्याता हैं। वे गम्भीर चिंतक व मनस्वी हैं। उन्होंने अपने निबन्ध-संग्रह साहित्य समाज और भारतीयता के माध्यम से पवित्र भावों और विचारों की जो त्रिवेणी प्रवाहित की है उसमें अवगाहन कर पाठक व श्रोता अपने आप को धन्य-धन्य समझते हैं।


प्रोफेसर रामपत यादव
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

डाॅ. अवस्थी के हृदय में करुणा का समुद्र है जिसमें अग्नि ज्वाला से निर्मित कमल लहलहा रहा है इसलिए उनके गद्य-काव्य में राष्ट्र प्रेम की ज्वाला, ललकार आदि सब कुछ है। डाॅ. अवस्थी राष्ट्र-भाषा हिन्दी के प्रति अपना सर्वस्व निछावर करते नहीं चूकते। मुझे याद है हिन्दी की प्रतिष्ठा हेतु मानक पदयात्रा पर उन्होंने कहा था कि राष्ट्र-भाषा हिन्दी के आन्दोलन में जो भी सक्रिय रूप से भागीदारी की आवश्यकता होगी मैं और मेरे साथी आप सबके साथ प्राणपण से रहेंगे।


प्रोफेसर सुशील राकेश
पं. सुन्दरलाल मेमोरियल स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कन्नौज

कालजयी-कृति को रचने वाला साहित्यकार कालजयी-योद्धा भी हो आवश्यक नहीं, पर साहित्य समाज और भारतीयता नामक यह प्रस्तुति एक कालजयी-योद्धा की अमर वाणी है। लोक के भीतर बैठे हुए हर जीवन की संवेदनात्मक अनुभूति है। इसमें आत्मिक विकास का चरण है और भूगोल का साहित्य में प्रकटन भी।

डाॅ. प्रभाकर कुमार अवस्थी
राणा शिक्षा शिविर स्नातकोत्तर महाविद्यालय 
पंचशीलनगर (हापुड़), उत्तर प्रदेश

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