आप्रवासी श्रमिक (Aapravasi Sharimaka)

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Authored By : Panday Prem Prakesh

Publisher: Northern Book Centre

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आप्रवासी श्रमिक (Aapravasi Sharimaka)

Summary of the Book


जीवन के लक्ष्य, जिनको पाने के लिये मनुष्य सदैव गतिमान रहता है, कई प्रकार के होते हैं, परन्तु सर्वसाधारण लक्ष्य सुखी और स्थिर जीवन की प्राप्ति हुआ करती है। भौतिक दृष्टि से सुखी-जीवन का आधार पर्याप्त अर्थ का संचय है। इसी ध्येय को पाने के लिए जब मनुष्य गतिमान होता है तो उसे आप्रवासी कहते हैं। दूसरे शब्दों में पर्याप्त आर्थिक साधनों की खोज ही आप्रवास का ध्येय है।

प्रस्तुत पुस्तक में पूर्वी उत्तर-प्रदेश से दिल्ली महानगर की ओर आप्रवासित होकर ओखला औद्योगिक क्षेत्र, नई दिल्ली में कार्यरत कुशल एवं अकुशल श्रमिकों के व्यावसायिक एवं परिवारिक जीवन का समाज-वैज्ञानिक एवं विवरण मूलक अध्ययन किया गया है।

अध्ययन की प्राक्कल्पना है कि आप्रवास के कारण आप्रवासियों के मूल-क्षेत्र की पारम्परिक पारिवारिक संरचना में परिवर्तन आया है। इस प्रक्रिया द्वारा श्रमिकों का उद्योग केन्द्रों की ओर स्थानान्तरण हुआ है, जिससे उनकी जातिगत संरचना, आर्थिक स्थिति, धार्मिक विश्वास तथा व्यवसाय भूमिका में भी परिवर्तन हुआ है।

निष्कर्ष स्वरुप ज्ञात हुआ कि आप्रवासी श्रमिकों के मूल-क्षेत्र की पारिवारिक और आर्थिक संरचना में परिवर्तन आया है, चाहे मूल-क्षेत्र की पृष्ठभूमि ग्रामीण हो या नगरीय। दोनों परिवेशों के श्रमिक ‘पश्ुा-पुल’ आप्रवास प्रक्रिया द्वारा दिल्ली की ओर स्थानान्तरित हुए है। आप्रवास के बाद जातिगत बन्धन ढीले पड़े हैं। आप्रवास के कारण श्रमिकों की मूल ग्रामीण पृष्ठभूमि में भी परिवर्तन हुआ है। इस प्रकार प्राप्त सभी निष्कर्ष आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन के सूचक हैं।

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