आदिवासी हरिजन - आर्थिक विकास (Aadivasi Harijan - Aarthika Vikas)

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Authored By : Palival Chander Mohan

Publisher: Northern Book Centre

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आदिवासी हरिजन - आर्थिक विकास (Aadivasi Harijan - Aarthika Vikas)

Summary of the Book

आदिवासी अंचल तथा उनमें निवास करने वाले आदिवासी-हरिजन व अन्य वर्गों का स्वरूप आर्थिक विकास के मार्ग में क्या है? उसका उत्तर देने का प्रयास इस ग्रन्थ में किया गया है। इस ग्रन्थ में पिछड़े क्षेत्र का विकास तथा वहां के लोग गरीबी की रेखा से कैसे ऊपर आवें, उसके लिए मौलिक चिन्तन, तथ्यात्मक सामग्री व 114 परिवारों का विभिन्न आयामों पर आर्थिक-सामाजिक लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है।

इस ग्रन्थ की विशेष्ष उपलब्धि एक यह भी है कि यह विभिन्न योजनाओं समितियों तथा आयामों के आदिवासी विकास दर्शन को अध्यतन सामग्री के साथ प्रस्तुत करता है।

समीक्षा

आपके शोध प्रबन्ध ‘‘मध्यप्रदेश में आदिवासियों का आर्थिक विकास’’ के कुछ तथ्य मुझे प्राप्त हुए है। तथ्यों को देखने से प्रतीत होता हैकि इस क्षेत्र के आदिवासियों के सामाजिक-आर्थिक जीवन के विभिन्न पहलुओं के यथार्थ रूप पर प्रकाश डालने का सराहनीय प्रयास किया गया है। आदिवासियों के जीवन को समझने तथा सरकार द्वारा इनके विकास के लिए तैयार किए गए अनेक कार्यक्रमों के प्रभावी कार्यान्वयन में ये तथ्य काफी हद तक संगत हो सकते है।

(शंकरराव चव्हाण), गृह मंत्री, भारत सरकार

प्रधान मंत्री जी मध्य प्रदेश में आदिवासियों के आर्थिक विकास पर लिखी आपकी पुस्तक ‘‘आदिवासी-हरिजन’’ के लिए धन्यवाद देते है।

20 जून 1986, (एच.वाई. शारदा पुसाद), प्रधान मंत्री कार्यालय

बस्तर जिले के आदिवासियों के आर्थिक सामाजिक जीवन के अध्ययन के आधार पर डा. चन्द्रमोहन पालीवाल ने अपने शोध प्रबंध्र ‘‘मध्य प्रदेश में आदिवासियों का अािर्थिक विकास’’ में तथ्यात्मक सामग्री के संकलन का प्रयास किया है। यह सामग्री हरिजन - आदिवासियों के विकास की योजनाओं को तैयार करने में उपयोगी संदर्भ हो सकती है।

23 जुलाई 1986, (मोतीलाल वोरा), मुख्य मंत्री, भोपाल

इस ग्रंथ में आदिवासियों के परिचय, उनके विकास की आयोजना, उक्त परिवारों की जनांनकिय कृषि, आय, जीवनस्तर, सम्पत्ति, व ऋणग्रस्तता के विषय में 10 अध्याय हैं, जिनमें लेखक ने हरिजनों व अन्य ग़ैर आदिवासियों के साथ आदिवासियों की जीवनचर्चा, उनकी मानसिक बौद्धिक स्थिति, उनके रीति-रिवाज व अन्यांे की अपेक्षा उनके स्वभाव में भोलेपन की विष्ेषताओं को उजागर किया है। लेखक ने एक संरक्षण योजना का सुझाव दिया है, जो विचारणीय है।

नित्यानन्द शर्मा, हिन्दुस्तान, 25, जनवरी 1987

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