मीसा बन्दी के पत्र (Messa Bandi ke Patra)

0 Reviews

Publisher: Northern Book Centre

Book Price: 200.00

Offer Price: 200.00

In Stock

Low cost in India and Worldwide.

मीसा बन्दी के पत्र (Messa Bandi ke Patra)

Summary of the Book

मैं नहीं सोच पा रही हूँ कि कहाँ से शुरू करूँ क्योंकि एक लम्बी पारी जी है मैंने उनके साथ।  बड़े ही सरल ढंग से सीमित परिवार में रहना हुआ।  मुझे क्या पता संघ क्या और जनसंघ क्या होता है। सबका परिचय यहीं हुआ और मैं अपने को उनके विचारों के अनुकूल ढालने का प्रयास करने लगी। उन्होंने अपने से अधिक राष्ट्र की साधना की है। घर परिवार से ऊपर उठकर कर्म में विश्वास। देश और समाज के प्रति निष्ठावान रहे। उनकी कथनी और करनी में कहीं भी विरोधाभास नहीं रहा। जहाँ भी कार्य किया पूरी ईमानदारी और निष्ठापूर्वक निभाया। जो भी व्यक्ति जुड़ा उसको भी यही घुट्टी पिला दी किसी को भायी किसी को नहीं भी किन्तु सामने कभी किसी ने उनके व्यवहार व व्यक्तित्व के कारण न नहीं कर पायी।

     उनका सोच अपने तक ही सीमित नहीं रहा जब बोलते तो लगता सरस्वती उनकी जिह्वा पर बैठ गई और लिखते तो सूर्य की रश्मि उनकी कलम को भिगोती सी जाती ''कभी खत्म न होने वाली स्याही बन गई'' उससे नि:सृत वेद, पुराण, इतिहास, भूगोल, समाज, अर्थ, विज्ञान हर विषय पर उनकी पकड़ बन गई।

     समुद्र की अतल गहराइयों से निकली उनकी सोच और सागर सी तरंगित भाषा जिसका कहीं आदि और अन्त नहीं, ग्रन्थ और पुस्तकें निकलती चली जा रही हैं। इतनी उम्र में भी न थकने वाली जीवटता ही उनका स्वभाव बन गया है। सटीक भाषा, आँकड़ों और चित्रों द्वारा अपनी बात लिखना, ऐसे तथ्य जिनका काट नहीं, उनके अन्तरमन से निकले वाक्यों को उनकी पुस्तकों में पढ़ा जा सकता है।

     विकट परिस्थितियों में भी धैर्य न छोड़ना, उनकी आदत में शामिल है। वही पाठ मुझे भी पढ़ाया। सन् 1975 में डी.आई.आर., मीसा लगा। घर में बीमार पिताजी व छ: बच्चों का बोझ मेरे ऊपर छोड़ कर जेल चले गये। 

     इसी बीच दो बार चोरी हुई, बच्चे बीमार, धन का अभाव फिर भी झुके नहीं। उनके पिताजी की मृत्यु पर 13 दिन के लिए पैरोल मिला, जब आये तो लगा कि सारा शहर ही इकठ्ठा हो गया है मानो किसी राजा की शवयात्रा जा रही हो।

     जो पत्र मेरे लिए जेल से भेजे थे उनका संग्रह कर रखती रही जो मीसा बन्दी के पत्र पत्नी के नाम से बनी। यदि उनके पत्र न मिले होते तो शायद इतनी अच्छी तरह घर, परिवार, समाज, देश के लिए कुछ करने का जज्बा न पैदा होता, न ही इतनी सामर्थय जुटा पाती। 'गीता का कर्मयोग' मैं कैसे भोग गई पता ही न चला तब कोई कष्ट, कष्ट ही नहीं लगा। उनकी वाणी ही मेरे जीवन की साधना बन गई।

शारदा देवी अवस्थी

 

Book Content

 

     पुरोवाक्
     प्रवर्तना
     परिदृश्य
     प्रतिध्वनि
     प्रस्फुटन
     प्रस्फुरण
     परिचय (डॉ. ब्रह्मदत्त अवस्थी)

 

पत्र 1 - जेल

पत्र 2 - अच्छाई

पत्र 3 - स्व-वैशिष्टय

पत्र 4 - कारागार

पत्र 5 - मनोबल

पत्र 6 - अभिव्यक्ति

पत्र 7 - कर्तव्य-पथ

पत्र 8 - कसौटी

पत्र 9 - उफ़ान

पत्र 10 - चट्टानी-दृढ़ता

पत्र 11 - व्याकुलता

पत्र 12 - शिवं के लिये कृति

पत्र 13 - सींकचे

पत्र 14 - विश्वास

पत्र 15 - लहरों के थपेडे़

पत्र 16 - अन्त:करण

पत्र 17 - भागीरथी

पत्र 18 - होली

पत्र 19 - व्यक्तित्व

पत्र 20 - सम्पर्क

पत्र 21 - परीक्षा

पत्र 22 - पशुता

पत्र 23 - गुप्तचरी

पत्र 24 - लोक-शक्ति

पत्र 25 - दीपावली

पत्र 26 - लोकतन्त्रा

पत्र 27 - हिन्दू-संस्कृति

     पुण्य-प्रसून

Author / Editors / Contributors

Reviews

Top reviews list the most relevant product review only. Show All instead?

There is no Review on this Book !!!

Recently Viewed

मीसा बन्दी के पत्र..

200.00

200.00